दिल्ली विश्वविद्यालय में रचयिता साहित्य उत्सव 2026 का उद्घाटन, भाषा और साहित्य पर विजेन्द्र गुप्ता का संबोधन
नई दिल्ली, 29 अक्टूबर 2026। दिल्ली विश्वविद्यालय में ‘रचयिता साहित्य उत्सव 2026’ के उद्घाटन सत्र में दिल्ली विधानसभा के माननीय अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता ने भाषा, साहित्य और राष्ट्रीय पहचान के गहरे संबंध पर जोर दिया। मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि किसी राष्ट्र की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं बनती, बल्कि उसकी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत से निर्मित होती है।
‘भाषा, साहित्य और देश’ विषय पर अपने विचार रखते हुए श्री गुप्ता ने कहा कि भाषा किसी समाज की चेतना, भावनाओं और सामूहिक स्मृति को अभिव्यक्त करती है। उनके अनुसार साहित्य उन विचारों और मूल्यों को स्थायित्व देता है, जिनसे एक समाज अपनी दिशा और पहचान पाता है।
“भाषा राष्ट्र की आत्मा है और साहित्य उसके विचारों एवं मूल्यों को स्थायी बनाता है।”
इस संबोधन का केंद्रीय संदेश स्पष्ट था। भारत की सभ्यतागत विरासत को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय भाषाओं, साहित्यिक परंपराओं और सांस्कृतिक स्मृतियों का संरक्षण आवश्यक है।

उद्घाटन सत्र में भाषा, साहित्य और देश पर केंद्रित रहा संबोधन
‘रचयिता साहित्य उत्सव 2026’ के उद्घाटन सत्र में श्री विजेन्द्र गुप्ता ने भाषा को केवल संवाद का साधन मानने की संकीर्ण समझ से आगे देखने की बात कही। उन्होंने कहा कि भाषा में समाज की संवेदना, लोक अनुभव, इतिहास, आस्था, संघर्ष और आकांक्षाएं एक साथ दर्ज होती हैं।
उनके अनुसार कोई भी भाषा अपने बोलने वालों की स्मृतियों को संजोती है। उसमें पीढ़ियों की कहानियां रहती हैं। उसमें लोकगीत भी होते हैं, नीति-वचन भी, संत साहित्य भी और आधुनिक जीवन की बेचैनियां भी। इसी कारण भाषा का संरक्षण केवल शब्दों का संरक्षण नहीं है, बल्कि समाज की आत्मा को बचाए रखने का कार्य है।
श्री गुप्ता ने कहा कि साहित्य इन अनुभवों को स्थायी रूप देता है। जो भाव किसी कालखंड में लोगों ने जिए, साहित्य उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाता है। यही कारण है कि साहित्य समय की सीमाओं को पार कर जाता है। वह इतिहास की तरह केवल घटनाएं नहीं बताता, बल्कि उन घटनाओं के भीतर मनुष्य की पीड़ा, साहस, प्रेम, विश्वास और संघर्ष को भी सामने लाता है।
सत्र में उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भाषा, साहित्य और राष्ट्रीय पहचान एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। किसी देश की राष्ट्रीय चेतना उसके संविधान, संस्थाओं और सीमाओं से जुड़ी होती है, पर उसकी सांस्कृतिक गहराई भाषा और साहित्य से आती है।
भारतीय साहित्यिक परंपरा ने विविधता को साझा सांस्कृतिक सूत्र दिया
अपने संबोधन में श्री गुप्ता ने कबीर, सूरदास, मीराबाई और तुलसीदास जैसे साहित्यकारों का उल्लेख किया। इन रचनाकारों ने भारतीय समाज के अलग-अलग पक्षों को स्वर दिया। किसी ने भक्ति को लोकभाषा में उतारा, किसी ने आध्यात्मिक अनुभव को सरल भाषा में व्यक्त किया, किसी ने सामाजिक प्रश्नों को सीधे और निर्भीक शब्दों में उठाया।
कबीर की वाणी ने धार्मिक आडंबरों और सामाजिक विभाजनों पर प्रश्न खड़े किए। सूरदास ने भक्ति, प्रेम और मानवीय भावनाओं को ब्रजभाषा की मधुरता में नया विस्तार दिया। मीराबाई ने अपनी काव्य-धारा में भक्ति को निजी साहस और आत्मस्वर से जोड़ा। तुलसीदास ने अवधी में रचना कर लोकभाषा को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विमर्श के केंद्र में रखा।
इन उदाहरणों के माध्यम से श्री गुप्ता ने बताया कि भारतीय साहित्य ने केवल क्षेत्रीय भाषाओं को समृद्ध नहीं किया, बल्कि देश को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ा। भारत की भाषाई विविधता विभाजन का कारण नहीं बनी, बल्कि उसने सांस्कृतिक संवाद को गहरा किया।
इस संदर्भ में उनका संदेश विशेष अर्थ रखता है। भारत में भाषाएं सिर्फ बोली नहीं जातीं, वे जीवन पद्धतियों को आकार देती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों की भाषाएं अपने साथ भोजन, त्योहार, लोककला, संगीत, कहावतें, कथाएं और सामाजिक व्यवहार की परंपराएं लेकर चलती हैं। साहित्य इन सबको व्यवस्थित स्मृति में बदल देता है।
भाषा संवाद से आगे बढ़कर सामूहिक स्मृति बनती है
श्री गुप्ता ने कहा कि भाषा किसी समाज की चेतना को व्यक्त करती है। यह बात भारतीय अनुभव में साफ दिखाई देती है। भारत में बच्चों की पहली लोरी से लेकर लोक उत्सवों के गीतों तक, स्वतंत्रता आंदोलन के नारों से लेकर आधुनिक कविता तक, भाषा ने सामूहिक भावनाओं को शब्द दिए हैं।
भाषा किसी समुदाय को अपने अतीत से जोड़ती है। जब कोई समाज अपनी भाषा में सोचता, पढ़ता और रचता है, तो वह अपने अनुभवों को स्वयं परिभाषित करता है। इसके विपरीत, जब भाषा कमजोर होती है, तो समाज अपनी स्मृतियों से दूर होने लगता है।
साहित्य इस स्मृति को और टिकाऊ बनाता है। लोककथाएं, महाकाव्य, संत काव्य, नाटक, उपन्यास, आत्मकथाएं और कविताएं समाज की अनेक परतों को दर्ज करती हैं। वे बताते हैं कि लोग कैसे जीते थे, किन प्रश्नों से जूझते थे, किन सपनों पर विश्वास करते थे और किन अन्यायों का सामना करते थे।
श्री गुप्ता ने यह भी कहा कि साहित्य भौगोलिक और सामाजिक सीमाओं से परे जाकर सामूहिक ज्ञान को संरक्षित करता है। यह बात विशेष रूप से भारत जैसे देश में महत्वपूर्ण है, जहां भाषाएं अनेक हैं, पर सांस्कृतिक संवाद निरंतर रहा है। एक क्षेत्र की कथा दूसरे क्षेत्र तक पहुंचती है। एक भाषा की भावधारा दूसरी भाषा में अनुवाद, पुनर्कथन और लोकपरंपरा के माध्यम से नया रूप लेती है।

विदेशी शासन के दौर में भी साहित्य ने सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखा
भाषा और साहित्य के ऐतिहासिक महत्व पर बोलते हुए श्री गुप्ता ने कहा कि किसी राष्ट्र की सभ्यता को कमजोर करने के प्रयास अक्सर उसकी भाषाई और साहित्यिक परंपराओं पर प्रहार से शुरू होते हैं। यह बात भारत के ऐतिहासिक अनुभव से जुड़ती है।
भारत ने लंबे समय तक राजनीतिक पराधीनता का दौर देखा, पर भारतीय भाषाओं और साहित्य ने सांस्कृतिक चेतना को जीवित बनाए रखा। जब राजनीतिक शक्ति विदेशी शासन के हाथों में थी, तब भी लोकभाषाओं में रचनाएं होती रहीं। भक्ति साहित्य, लोकनाट्य, क्षेत्रीय काव्य, कहानियां और जनगीत समाज के भीतर आत्मबोध को बनाए रखते रहे।
भाषा ने लोगों को यह याद दिलाया कि वे कौन हैं, किस परंपरा से आते हैं और उनकी सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हैं। साहित्य ने इस स्मृति को भावनात्मक शक्ति दी। इसी कारण अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों में भाषा की भूमिका निर्णायक रही।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी भारतीय भाषाओं ने जनजागरण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अखबारों, पत्रिकाओं, कविताओं, गीतों और सभाओं के माध्यम से स्वाधीनता का विचार लोगों तक पहुंचा। यह केवल राजनीतिक संदेश नहीं था। यह आत्मसम्मान, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय चेतना का संदेश भी था।
श्री गुप्ता का संबोधन इसी ऐतिहासिक तथ्य की ओर संकेत करता है कि भाषा और साहित्य किसी भी समाज के लिए सजावटी तत्व नहीं हैं। वे उसकी सांस्कृतिक रक्षा, आत्मपहचान और निरंतरता के आधार हैं।
राष्ट्रीय पहचान में क्षेत्रीय भाषाओं की भूमिका
भारत की राष्ट्रीय पहचान एक भाषा या एक संस्कृति पर आधारित नहीं है। यह अनेक भाषाओं, लोकधाराओं और साहित्यिक परंपराओं के सह-अस्तित्व से बनी है। श्री गुप्ता के संबोधन में यही विचार प्रमुख रूप से सामने आया कि भाषाई विरासत का संरक्षण राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसके पक्ष में है।
जब क्षेत्रीय भाषाएं मजबूत होती हैं, तो स्थानीय समाज अपनी सांस्कृतिक ऊर्जा के साथ राष्ट्रीय जीवन में योगदान देता है। क्षेत्रीय साहित्य स्थानीय अनुभवों को सामने लाता है। यह बताता है कि किसी किसान, कारीगर, विद्यार्थी, स्त्री, श्रमिक, संत, कवि या आम नागरिक ने अपने समय को कैसे समझा।
भारतीय साहित्य की ताकत इसी बहुलता में है। हिंदी, संस्कृत, तमिल, बांग्ला, मराठी, पंजाबी, असमिया, उर्दू, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु, ओड़िया, गुजराती, कश्मीरी, मैथिली और अन्य अनेक भाषाओं ने भारत की संवेदना को विस्तार दिया है। हर भाषा ने अपने समाज की स्मृति को सहेजा और भारत की सामूहिक चेतना में कुछ जोड़ा।
इस दृष्टि से भाषा संरक्षण का अर्थ केवल शब्दकोश बनाना या पाठ्यक्रम तैयार करना नहीं है। इसका अर्थ है भाषाओं में पढ़ने, लिखने, बोलने और रचने की जीवित परंपरा को मजबूत रखना। साहित्य उत्सव इसी कार्य में सहायक हो सकते हैं, क्योंकि वे लेखकों, पाठकों, विद्यार्थियों और विचारकों को संवाद के एक साझा मंच पर लाते हैं।
साहित्य उत्सवों की भूमिका केवल आयोजन तक सीमित नहीं
दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे शैक्षणिक परिसर में ‘रचयिता साहित्य उत्सव 2026’ का आयोजन अपने आप में महत्वपूर्ण है। विश्वविद्यालयों में साहित्यिक संवाद केवल अकादमिक अभ्यास नहीं होता। वह युवाओं को भाषा, विचार और समाज के बीच संबंध समझने का अवसर देता है।
ऐसे उत्सवों में कविता, कहानी, आलोचना, नाटक, अनुवाद, प्रकाशन और पाठन संस्कृति पर चर्चा संभव होती है। नए लेखक वरिष्ठ रचनाकारों से सीखते हैं। विद्यार्थी पाठ्यक्रम से बाहर साहित्य की जीवित दुनिया को देखते हैं। पाठक लेखक से सीधे संवाद कर पाते हैं। भाषा किसी पुस्तकालय की अलमारी से निकलकर सार्वजनिक बातचीत का हिस्सा बनती है।
श्री गुप्ता का संबोधन इसी व्यापक संदर्भ से जुड़ा था। उन्होंने भाषा और साहित्य को राष्ट्रीय पहचान की बुनियादी शक्ति के रूप में देखा। उनके विचार में साहित्य पीढ़ियों के सुख-दुःख, संघर्षों और आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देता है। यही अभिव्यक्ति समाज को अपने अतीत से जोड़ती है और भविष्य के लिए दिशा भी देती है।
आज जब डिजिटल माध्यमों के कारण पढ़ने और लिखने के तरीके बदल रहे हैं, साहित्य उत्सवों की भूमिका और बढ़ जाती है। वे पाठकों को याद दिलाते हैं कि भाषा का गहरा उपयोग केवल त्वरित संदेशों में नहीं, बल्कि विचारपूर्ण अभिव्यक्ति में होता है। भाषा जितनी समृद्ध होगी, समाज की सोच भी उतनी ही व्यापक और सूक्ष्म होगी।
युवाओं के लिए संदेश स्पष्ट रहा
रचयिता साहित्य उत्सव में दिया गया यह संबोधन युवाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण था। विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाली पीढ़ी डिजिटल भाषा, वैश्विक संपर्क और बदलती अभिव्यक्ति शैली के बीच बड़ी हो रही है। ऐसे समय में मातृभाषा, लोकभाषा और भारतीय भाषाओं के साहित्य से जुड़ना सांस्कृतिक आत्मविश्वास देता है।
भाषा का प्रश्न केवल अतीत से जुड़ा नहीं है। यह भविष्य से भी जुड़ा है। जब युवा अपनी भाषाओं में सोचने, शोध करने और लिखने की क्षमता विकसित करते हैं, तो ज्ञान का लोकतंत्रीकरण होता है। शिक्षा और विचार अधिक लोगों तक पहुंचते हैं। साहित्य इस प्रक्रिया में संवेदनशीलता जोड़ता है।
श्री गुप्ता ने अपने संबोधन में जिस सांस्कृतिक विरासत की बात की, वह स्थिर या बंद परंपरा नहीं है। भाषा तभी जीवित रहती है जब उसमें नए अनुभव आते हैं। साहित्य तभी आगे बढ़ता है जब नई पीढ़ी अपने समय के प्रश्नों को अपनी भाषा में दर्ज करती है।
इसीलिए भाषा संरक्षण का अर्थ केवल पुराने ग्रंथों को बचाना नहीं है। यह नई कविता, नई कहानी, नए नाटक, नए अनुवाद और नए विमर्श को भी प्रोत्साहित करना है। परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद ही साहित्य को जीवित रखता है।
सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की चर्चा का व्यापक महत्व
भारत की सांस्कृतिक विरासत बहुत विस्तृत है। इसमें स्मारक, कला, संगीत, नृत्य, दर्शन, धर्म, लोकपरंपराएं और ज्ञान प्रणालियां शामिल हैं। पर इन सबको समझने की कुंजी भाषा में छिपी होती है। यदि भाषा से दूरी बढ़ती है, तो सांस्कृतिक अर्थ भी धुंधले होने लगते हैं।
श्री गुप्ता ने इसीलिए भाषा और साहित्य को राष्ट्रीय पहचान से जोड़ा। यह दृष्टि बताती है कि सांस्कृतिक संरक्षण केवल संग्रहालयों या अभिलेखागारों का विषय नहीं है। यह घर, विद्यालय, विश्वविद्यालय, पुस्तकालय, रंगमंच, प्रकाशन और सार्वजनिक संवाद से जुड़ा हुआ कार्य है।
किसी समाज की सभ्यता उसकी स्मृतियों से बनती है। स्मृतियां भाषा के बिना टिकती नहीं। साहित्य इन स्मृतियों को आकार देता है, उन्हें अर्थ देता है और उन्हें पीढ़ियों तक पहुंचाता है। यही कारण है कि भाषा और साहित्य पर दिया गया यह संबोधन एक साहित्यिक आयोजन की सीमा से आगे जाता है।
यह संबोधन उस व्यापक प्रश्न को सामने रखता है कि भारत अपनी भाषाई विविधता को आने वाले दशकों में किस तरह जीवित, सक्रिय और रचनात्मक बनाए रखेगा। इसका उत्तर केवल नीति में नहीं, बल्कि समाज की भागीदारी में भी है। जब लोग अपनी भाषाओं में पढ़ेंगे, लिखेंगे और संवाद करेंगे, तभी साहित्यिक परंपरा आगे बढ़ेगी।
रचयिता साहित्य उत्सव 2026 से निकला प्रमुख संदेश

दिल्ली विश्वविद्यालय में रचयिता साहित्य उत्सव 2026 का उद्घाटन भाषा और साहित्य की भूमिका पर गंभीर चर्चा के साथ शुरू हुआ। श्री विजेन्द्र गुप्ता के संबोधन ने यह रेखांकित किया कि राष्ट्र की शक्ति केवल राजनीतिक या आर्थिक संरचनाओं से नहीं आती। वह अपनी सांस्कृतिक स्मृति, भाषाई आधार और साहित्यिक चेतना से भी शक्ति पाता है।
उनका संदेश तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण रहा।
भाषा समाज की आत्मा को व्यक्त करती है इसमें चेतना, भावना, परंपरा और सामूहिक स्मृति शामिल होती है।
साहित्य मूल्यों को स्थायी बनाता है यह पीढ़ियों के अनुभवों, संघर्षों और आकांक्षाओं को सुरक्षित रखता है।
भारतीय भाषाओं का संरक्षण राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करता है विविध भाषाएं भारत की साझा सांस्कृतिक चेतना को विस्तार देती हैं।
साहित्य उत्सव का उद्घाटन इस विचार के साथ हुआ कि भाषा को बचाना, सिर्फ बोलियों और शब्दों को बचाना नहीं है। यह समाज की स्मृति, संवेदना और आत्मसम्मान को बचाने का कार्य है। यही उस संबोधन का सबसे स्थायी संदेश रहा।




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